नजीबाबाद की हस्तनिर्मित शॉल की कला: एक विरासत जो अब भी ज़िंदा है
रिपोर्टर: मरगूब हुसैन नासिर , नजीबाबाद से विशेष रिपोर्ट
नजीबाबाद, बिजनौर (उत्तर प्रदेश):
शानदार कारीगरी, महीन धागों का जादू और पीढ़ियों पुरानी विरासत — यही है नजीबाबाद की हस्तनिर्मित शॉल की पहचान। आज जब दुनिया मशीनों और फैशन ब्रांड्स के पीछे भाग रही है, नजीबाबाद के कुछ हुनरमंद कारीगर अब भी अपने हाथों से गर्मी और कला का अनोखा मेल तैयार कर रहे हैं — “हस्तनिर्मित शॉल”।
कला जो घरों में जन्मी
नजीबाबाद के पुराने मोहल्लों में आज भी कुछ ऐसे घर हैं जहां महिलाएं और पुरुष मिलकर हाथ से शॉल बुनते हैं। यह परंपरा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलती आ रही है। यहां के कारीगर बिना किसी मशीन की मदद से, सिर्फ हथकरघा और हाथों की सफाई से महीनों में एक शॉल तैयार करते हैं।
कैसे बनती है एक हस्तनिर्मित शॉल?
इस प्रक्रिया की शुरुआत होती है ऊन के चयन से। खासतौर पर कश्मीर से मंगाई गई उच्च गुणवत्ता वाली ऊन को पहले धोया जाता है, फिर सुखाया और रंगा जाता है।
इसके बाद पारंपरिक हथकरघा (लूम) पर धागों को इस तरह से सजाया जाता है कि महीनों की मेहनत के बाद एक खूबसूरत डिज़ाइन उभरकर आता है। कुछ डिज़ाइन इतने जटिल होते हैं कि उन्हें पूरा करने में 3 से 6 महीने तक का समय लग सकता है।
कढ़ाई: जहां रंग और धागा मिलते हैं
शॉल में कढ़ाई का काम एक अलग ही स्तर पर होता है। फूलों की बेलें, पारंपरिक मुगल शैली की डिज़ाइन, और स्थानीय जीवन के चित्र शॉल पर उकेरे जाते हैं। यह काम आमतौर पर महिलाएं करती हैं, और हर टांका उनकी मेहनत और धैर्य की मिसाल होती है।
बाज़ार में पहचान और चुनौती
नजीबाबाद की शॉल उत्तर प्रदेश के अलावा दिल्ली, पंजाब और यहां तक कि विदेशों तक भेजी जाती हैं। लेकिन आज के दौर में मशीन से बनी सस्ती शॉलों के चलते इस कला को खतरा भी है। कई युवा कारीगर इस पेशे से दूर हो रहे हैं, क्योंकि मेहनत ज़्यादा है और मुनाफा कम।
सरकारी सहयोग की आवश्यकता
स्थानीय कारीगरों का मानना है कि अगर सरकार हस्तशिल्प को बढ़ावा दे और ई-कॉमर्स के जरिए इनके उत्पादों को ग्लोबल मार्केट तक पहुंचाए, तो यह कला न सिर्फ ज़िंदा रहेगी, बल्कि और भी फूले-फलेगी।
नजीबाबाद की पहचान
नजीबाबाद सिर्फ एक छोटा शहर नहीं है, यह कला, संस्कृति और इतिहास की धरोहर है। यहां की हस्तनिर्मित शॉलें न केवल सर्दियों में गर्माहट देती हैं, बल्कि एक पूरे इतिहास को अपने भीतर समेटे होती हैं।
तो अगली बार जब आप किसी हस्तनिर्मित शॉल को देखें, तो समझिएगा कि उसमें सिर्फ ऊन नहीं, बल्कि एक कारीगर का सपना, मेहनत और नजीबाबाद की आत्मा बुनी हुई है।

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